कुछ याद आ गए हैं वो मौसम बहार के
ऐसे भले सुख़न है कहें उस ने प्यार के
मदहोश क्यूँ हुए हैं ये हम से तो पूछिए
ज़ुल्फ़ें झटक के वो है गए मुँह पे मार के
जज़्बात थे मेरे वो अँगूठी महज़ न थी
तुम ने जो फेंक दी है अँगूठी उतार के
मुझ जैसे बिगड़े शख़्स को अच्छा बना दिया
लेकिन बिछड़ गया है वो हम को सुधार के
— Ankit gupta















