लगता है जैसे हिज्र में कुछ भी बचा नहीं
मेरा ख़ुदा भी इन दिनों मेरा ख़ुदा नहीं
मैं ख़ुश बहुत था उस घड़ी तेरे विसाल में
जब हिज्र से हुआ था मेरा सामना नहीं
ख़ुदगर्ज़ कैसे इश्क़ में हो जाऊँ मैं तेरे
घर से शरीफ़ लड़का कभी भागता नहीं
कितना मैं रो रहा हूँ मगर जानता हूँ ये
जो जा चुका है रोने से वो लौटता नहीं
— Ankit gupta















