साल ये भी चला गया आख़िर
ये बता क्या नया हुआ आख़िर
हम ने तक़दीर को ही समझा सब
और सब कुछ हुआ बुरा आख़िर
चार दिन में बिछड़ गए हम तुम
जिस का डर था वही हुआ आख़िर
वस्ल की रात साथ में हम ने
हिज्र का ज़हर भी पिया आख़िर
पहले तो साथ चलते थे दोनों
उस ने रस्ता बदल लिया आख़िर
हम ने हरदम उसे मुहब्बत दी
उस ने फिर ग़म दिया नया आख़िर
— Ankit gupta















