हुस्न का इम्कान समझा देर से
मैं नफ़ा-नुक़्सान समझा देर से
उस के आशिक़ उस के बारे में मेरा
भर रहे थे कान,समझा देर से
मुझ को पहले दिन से उस से इश्क़ था
और वो नादान समझा देर से
जो समझना ज़िन्दगी की शर्त थी
उस को ही इंसान समझा देर से
— Armaan khan
मैं नफ़ा-नुक़्सान समझा देर से
उस के आशिक़ उस के बारे में मेरा
भर रहे थे कान,समझा देर से
मुझ को पहले दिन से उस से इश्क़ था
और वो नादान समझा देर से
जो समझना ज़िन्दगी की शर्त थी
उस को ही इंसान समझा देर से
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