तिरी याद की लहर उठे जा रही है

कि बंजर ज़मीं नम किए जा रही है

उदासी हमारी बढ़े जा रही है
ख़ुशी एक ऐसे चुभे जा रही है

अँधेरा हुआ जा रहा है मुसलसल
जुदा जिस तरह तू हुए जा रही है

अज़िय्यत मिलेगी करेंगे अगर इश्क़
तबीयत उधर ही लिए जा रही है

न मंज़िल मिली है न राही रुका है
मियाँ उम्र यूँ ही कटे जा रही है

कि अहद-ए-वफ़ा उस ने मुझ से किया था
वफ़ा ग़ैर से वो करे जा रही है

जुदा हो के तुझ से सलामत हूँ मैं भी
बिछड़ के न तू ही मरे जा रही है

मुहब्बत में वो क़त्ल कर के मिरा यूँ
कि मासूम कितनी बने जा रही है

कि हम पूछते हैं ये क्या शैख़ जी से
गली कौन सी मय-कदे जा रही है

— Azhan 'Aajiz'

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