Azhan 'Aajiz'

Azhan 'Aajiz'

@Azhan-Aajiz

MOHAMMAD AZHAN AARIZ shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in MOHAMMAD AZHAN AARIZ's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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Sher

तारीख़ उठाऊँ दिल दिखाऊँ मुझ सेे क्या माँगा गया हिंदोस्तानी होने का मेरे पता माँगा गया — Azhan 'Aajiz'
मुसलसल छे बरस गुज़रे उसी की चाहतों में मगर उस को कभी इस की ख़बर थी है न होगी — Azhan 'Aajiz'
तुम्हारे वास्ते हम ने क्या क्या नहीं किया कहे रहे हो कि ऐसा वैसा नहीं किया — Azhan 'Aajiz'
बिखरते-उलझते शबो-रोज़ कैसे गुज़ारें भला थकन जिस्म की ज़िन्दगी बोल कैसे उतारें भला — Azhan 'Aajiz'
बरसती है यहाँ रहमत ख़ुदा की ज़मीं है ये मिरे वारिस पिया की — Azhan 'Aajiz'
तुझ सेे बिछड़ कर अक्सर ऐसा रहता हूँ महफ़िल में भी मैं सिर्फ़ तन्हा रहता हूँ — Azhan 'Aajiz'
बिखरा पड़ा हूँ मुझे आग़ोश में न कर मदहोश हूँ रहने दे तू होश में न कर — Azhan 'Aajiz'
तुम बिछड़ रहे हो अब दोस्त इस सफ़र में क्यूँँ बात मत बनाओ अब, सब समझ रहा हूँ मैं — Azhan 'Aajiz'
बड़े बूढ़े हमारे दरमियाँ से क्या गए समझिए आप सहरा से कोई दरिया गया — Azhan 'Aajiz'
तुम्हें ही जब नहीं मुझ पर यक़ीं तो फिर भला क्यूँँ ख़ुद पर अब ईमान लाऊँ मैं — Azhan 'Aajiz'
मीर जैसे बोल बोलूँ जॉन जैसी शा'इरी मैं हो ये अन्दाज़े-बयाँ ग़ालिब सा फिर इक़बाल सा मैं — Azhan 'Aajiz'
कोई हसीं दिवाना मुझ को न कर सकी पर एक साँवली ने पागल बना दिया — Azhan 'Aajiz'
तुझे रास्तों का पता न था मुझे मंज़िलों की ख़बर नहीं तिरा वाक़िआ कोई और था मिरा हादसा कोई और है — Azhan 'Aajiz'
किसी इक गहरे क़ुल्ज़ुम की तरह हैं ये तिरी आँखें किसी भी रोज़ इन में डूब कर मैं मर ही जाऊँगा — Azhan 'Aajiz'
इस तरह मजबूरियों में दूर हैं अपने वतन से जिस तरह परवाज़ करती है यहाँ ये रूह तन से — Azhan 'Aajiz'
इन मुसीबतों से अब यूँँ उलझ रहा हूँ मैं शुक्र है कि थोड़ा ही, पर सुलझ रहा हूँ मैं — Azhan 'Aajiz'

Ghazal

तिरी याद की लहर उठे जा रही है कि बंजर ज़मीं नम किए जा रही है उदासी हमारी बढ़े जा रही है ख़ुशी एक ऐसे चुभे जा रही है अँधेरा हुआ जा रहा है मुसलसल जुदा जिस तरह तू हुए जा रही है अज़िय्यत मिलेगी करेंगे अगर इश्क़ तबीयत उधर ही लिए जा रही है न मंज़िल मिली है न राही रुका है मियाँ उम्र यूँँ ही कटे जा रही है कि अहद-ए-वफ़ा उस ने मुझ सेे किया था वफ़ा ग़ैर से वो करे जा रही है जुदा हो के तुझ सेे सलामत हूँ मैं भी बिछड़ के न तू ही मरे जा रही है मुहब्बत में वो क़त्ल कर के मिरा यूँँ कि मासूम कितनी बने जा रही है कि हम पूछते हैं ये क्या शैख़ जी से गली कौन सी मय-कदे जा रही है — Azhan 'Aajiz'
सब ने माँगी है दुनिया में रह कर दुनिया सो किस को कितनी हो सकी मुयस्सर दुनिया जैसे रेत फिसलती है मुट्ठी में आ कर ऐसे हाथ से मेरे फिसली अक्सर दुनिया उस को लगता है दुनिया चारा-गर है पर इल्म नहीं उस को कितनी है सितमगर दुनिया ऐसी मुनाफ़िक़त से हैरत में हूँ गोया बस्ती है इक दुनिया के भी अंदर दुनिया मैं इस दुनिया से बेहतर हूँ लेकिन फिर भी उस को लगती है बस और बस बेहतर दुनिया हैरानी में सोचो मैं हूँ जब से देखा रहती है जो दुनिया से ही डर कर दुनिया सब को इक रोज़ कूच करना है दुनिया से दुनिया वालों मत समझो है मुक़द्दर दुनिया जिस को है ख़्वाहिश दुनिया की उस को मुबारक 'आरिज़' ने न बिठाई अपने सर पर दुनिया — Azhan 'Aajiz'
रह कर ज़मीं पे जब ख़्वाब आसमाँ का रखना दिल में उड़ान का अपने तुम जज़्बा रखना पत्थर कभी तुम्हें बंदिशें मिलेंगी लेकिन पैहम मुसाफ़िरो कारवाँ हमेशा रखना ऊँचाइयों तलक लाख तुम चले जाना पर जब भी मिलो बुज़ुर्गो से सर नीचा रखना मैं ढूँढ़ते हुए रौशनी कभी आ जाऊँ मेरे भी नाम का तुम चराग़ जलता रखना इस की तरफ़ गया हो गया वही बेगाना 'आरिज़ अज़ीज़' दुनिया से फ़ासला सा रखना आ कर ग़ुरूर में लोग गिर गए मुँह के बल अपना ग़ुरूर के साथ कुछ न रिश्ता रखना बेशक बिछड़ रहे हैं हम आज यारो लेकिन सब याद में मगर अपना आना जाना रखना भटका हुआ मुसाफ़िर वो लौट आए शायद घर का खुला हुआ इक तुम दरवाज़ा रखना — Azhan 'Aajiz'
ग़म हमें आप का नहीं मिलता ये हमें मर्तबा नहीं मिलता कोई भी रास्ता नहीं मिलता अब यहाँ रहनुमा नहीं मिलता आप ही इक हमें न मिल पाए वर्ना दुनिया में क्या नहीं मिलता मिल गए शख़्स तो बहुत गोया आपसा दूसरा नहीं मिलता आशिक़ों को फ़क़त सनम न मिले दहर-ए-फ़ानी में क्या नहीं मिलता अब यहाँ चाँदनी नहीं मिलती तो यहाँ चाँदना नहीं मिलता घर में छोटे बड़े बने जब से घर में कोई बड़ा नहीं मिलता मिल गई हैं रफ़ाक़तें सब की क़ुर्ब बस आप का नहीं मिलता सब मिला है जहान में लेकिन सिर्फ़ अहल-ए-वफ़ा नहीं मिलता जो तिरे इस्म से पिलाए मय वो हमें मय-कदा नहीं मिलता शख़्स आरिज़ अज़ीज़ मिलते हैं पर यहाँ आइना नहीं मिलता — Azhan 'Aajiz'
सिवा तेरे नज़र कोई न आया है मुझे मिरे हमदम कि तूही सिर्फ़ भाया है मुझे ठिकाने इश्क़ ने तेरे लगाया है मुझे तिरे इस हुस्न ने शाइ'र बनाया है मुझे यहाँ हर शय मिरी उस्ताद है यूँँ दोस्तो सभी ने कुछ न कुछ देखो सिखाया है मुझे मुझे आता नहीं कुछ भी सिवाए इश्क़ के फ़क़त इक पाठ उल्फ़त का पढ़ाया है मुझे जिसे इक आँख भर के आज तक देखा नहीं उसी का शहर ने आशिक़ बताया है मुझे निभाई दुश्मनी बस दोस्ती की आड़ में सभी ने दोस्त बन कर ही हराया है मुझे गिले शिकवे बहुत हैं तुझ सेे पर करता नहीं कि तू ने ज़िन्दगी कितना सताया है मुझे दिया था मैं कि करता रौशनी तेरे लिए भला क्या सोच कर तू ने बुझाया है मुझे अँधेरों में रखा झूटी तसल्ली दी रफ़ीक़ मुहब्बत में फ़क़त पागल बनाया है मुझे तुझे क्या है ख़बर ऐ हम-नशीं जान-ए-नज़र तिरी यादों ने कितनी शब जगाया है मुझे यहाँ होता रहा ज़ेर-ओ-ज़बर मैं हर घड़ी गिराया इसने तो उस ने उठाया है मुझे बिखरना है दुबारा टूट के आरिज़ मुझे किसी ने ख़्वाब कह कर फिर सजाया है मुझे — Azhan 'Aajiz'
हर शख़्स और सब दिल उदासी के हैं शिकार इनको ख़बर न ग़ाफ़िल उदासी के हैं शिकार दरिया तो दरिया हैं कि इन्हें क्या मलाल है जितने हैं देख साहिल उदासी के हैं शिकार ग़म चाहिए अजीब तलब है इन्हें भी अब आए हैं यार साइल उदासी के हैं शिकार यूँँ भी उदास बज़्म नज़र आ रही है दोस्त वो जो हैं सद्र-ए-महफ़िल उदासी के हैं शिकार बोलें हँसें कि आँख न नम हो ज़रा मियाँ ऐसा तो करना मुश्किल उदासी के हैं शिकार इश्क़-ओ-फ़िराक़ का न जिन्हें इल्म है ज़रा ऐसे भी यार जाहिल उदासी के हैं शिकार राहत मिले इन्हें कि अब आज़ार में फ़क़त आरिज़ अज़ीज़ कामिल उदासी के हैं शिकार — Azhan 'Aajiz'
इस ज़मीं की तह में हम तुम वो हमारे जाएँगे देर से या जल्द सब के सब उतारे जाएँगे हम बिगाड़े जाएँगे गोया सँवारे जाएँगे हर तरह के मौसमों से हम गुज़ारे जाएँगे सिर्फ़ इनता सोच कर इस को झटकते ही नहीं आस्तीं से निकले जितने साँप मारे जाएँगे डाल कर इक्सीर में हम दोस्त बातों की यहाँ सोने-चाँदी की तरह ऐसे निखारे जाएँगे वक़्त रहते अब अना से ख़ुद उतर ही जाइए फिर वगरना आप रुस्वा कर उतारे जाएँगे नाम अपना है नहीं जुगनूँ तलक में भी अभी आरज़ू ये हम चराग़ों में पुकारे जाएँगे इल्म है हाँ किस तरह तड़पा के मारा जाएगा शहर से उस के गली से हम गुज़ारे जाएँगे नफ़रतों की बोलियाँ तुम मत सिखाओ यूँँ इन्हें होएगा तन्हा फ़लक तोड़े जो तारे जाएँगे तुम अभी वाक़िफ़ नहीं तक़दीर के इस खेल से हम डुबो कर सागरों में फिर उभारे जाएँगे है अभी ख़ामोश दरिया इस में हलचल हो कोई आएगा तूफ़ाँ सफ़ीने फिर किनारे जाएँगे देख वो आए न आए फ़ैसला उस का मगर हम पुकारे जाएँगे उस को पुकारे जाएँगे आ गया इन के सहारे इस तरफ़ 'आरिज़ अज़ीज़' बे-सहारे किस तरफ़ किस के सहारे जाएँगे — Azhan 'Aajiz'
हमारा तो जहाँ में बस बना यूँँही तमाशा है ख़ुदा जाने हमारे इस नसीबा में लिखा क्या है तुम्हारे हिज्र ने तो मार ही डाला हमें जानाँ किया है इश्क़ तुम सेे बस ख़ता इस के सिवा क्या है न तुम ही मिल सके हम को न दुनिया ने ही अपनाया हमें तो बस कि अब तन्हाइयों का ही सहारा है भुला दें हम उसे कैसे बताओ अब तुम्हीं हम को हमारी रूह साँसों में जो नस-नस में समाया है तुम्हारा इंतिज़ार अब उम्र भर करते रहेंगे हम हमें मालूम है जानाँ कि दस्तूर-ए-वफ़ा क्या है न जाने क्यूँ कि तुम सेे इश्क़ हम ने कर लिया जानाँ हमें मालूम था इस में ख़सारा ही ख़सारा है तुम्हारी बे-वफ़ाई का गिला-शिकवा नहीं हम को कि है इस बात का ग़म तुम न आए जब पुकारा है यहाँ पर जो हमारा था नहीं वो भी हमारा अब तुम्हारा कुछ नहीं है पर कि सब फिर भी तुम्हारा है समझ आ ही गई अब बात ये आरिज़ अज़ीज़ अपने कि दुनिया क़ैद है इक ज़िन्दगी भी एक धोका है — Azhan 'Aajiz'
वो एक ख़्वाब जिस को बचपन से देखता हूँ वो ग़ैर को मिलेगा तो फिर बुरा लगेगा — Azhan 'Aajiz'
तुम्हारी यार हसरत ने मुझे ज़िन्दा रखा तुम्हारी ही मुहब्बत ने मुझे ज़िन्दा रखा समझदारी ने कब का मार डाला था मुझे मगर मेरी हिमाक़त ने मुझे ज़िन्दा रखा कि दिल में दोस्त हैबत मौत की बैठी हुई मगर इस दिल की हैबत ने मुझे ज़िन्दा रखा मुझे तो दोस्तो की दोस्ती ने मारा है कि दुश्मन की अदावत ने मुझे ज़िन्दा रखा मुझे हैरत कि तन्हाई में भी ज़िन्दा रहा मगर इस एक हैरत ने मुझे ज़िन्दा रखा मुहब्बत इंतिज़ार-ओ-वस्ल-ओ-तन्हाई फ़िराक़ यहाँ हर एक वहशत ने मुझे ज़िन्दा रखा उजाले सुब्ह तो क़ातिल लगे अपने मुझे अँधेरी रात ज़ुल्मत ने मुझे ज़िन्दा रखा मुझे मारा कि तेरी यार आदत ने मगर तिरी ही यार आदत ने मुझे ज़िन्दा रखा मुझे तो मार डाला था फ़साने में किसी मगर मेरी हक़ीक़त ने मुझे ज़िन्दा रखा हक़ीक़त बात तो ये है सुनो मेरे अज़ीज़ ख़ुदा की ही इनायत ने मुझे ज़िन्दा रखा — Azhan 'Aajiz'

Nazm