मुझे उर्दू की हासिल गुफ़्तगू है
मिरे लहजे में भी इक मुश्क-बू है
मिरी जो यार हस्ब-ए-आरज़ू है
फ़क़त तू और तू है सिर्फ़ तू है
पता मेरा नहीं कुछ मुझ में लेकिन
बसा कोई तू है फिर हू-ब-हू है
मुयस्सर तू न होगा इल्म है पर
मुझे फिर भी तिरी ही जुस्तजू है
तिरा चेहरा बसा आँखों में मेरी
कि दिखता तू मुझे अब चार-सू है
हमारे दिल मुहल्ला में तिरी याद
अज़ीज़म कू-ब-कू है कू-ब-कू है
हुआ क्या हादसा दरपेश 'आजिज़'
ख़ुदा की सम्त तेरा जो रुजू है
As you were reading Shayari by Azhan 'Aajiz'
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