ज़माने में किसी से गर मुहब्बत कीजिए
उसे फिर बोलने की आप हिम्मत कीजिए
ग़रज़ में आप करते हैं उसे सजदे सदा
दिल-ओ-जाँ से ख़ुदा की आप इबादत कीजिए
लिए फिरते हैं अपनी सोच सब अपनी समझ
यहाँ पर अब कि किस किस को वज़ाहत कीजिए
बिछड़ कर आपसे दिल तो कहीं लगता नहीं
कहाँ पर जाइए किस से रफ़ाक़त कीजिए
वही गुज़रे ज़माने का पुराना इक ख़िताब
ग़ज़ल में कुछ नई अब तो ख़िताबत कीजिए
तरफ़दार आप के हर सम्त आते हैं नज़र
किसी से आप की क्या ही शिकायत कीजिए
कहा था इश्क़ मत करना मियाँ लेकिन नहीं
फ़क़त अब उम्र भर यूँही नदामत कीजिए
— Azhan 'Aajiz'















