उम्र गुज़री है फ़ासला न गया

हम से यकजा कभी हुआ न गया

दिल सुकूँ जान कुछ रहा न गया
इश्क़ का दर्द तो सहा न गया

हिज्र तेरा गुज़ार कर जानाँ
इश्क़ भी दूसरा किया न गया

ग़म नहीं जो शिकस्त पाई है
शुक्र है दोस्त हौसला न गया

लौट आया यही गुमाँ कर के
रास्ता तुझ तलक गया न गया

ख़ामुशी इस तरह हुई तारी
कहना तो दूर कुछ लिखा न गया

जाम पी कर तिरी निगाहों से
दस्त-ए-साक़ी से फिर पिया न गया

बिन तिरे ज़ीस्त थी बसर करनी
एक पल भी मगर रहा न गया

ख़ूब ग़ज़लें कहूँगा सोचा था
शे'र इक भी मगर कहा न गया

— Azhan 'Aajiz'

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