हर किसी को याद दिलबर की सताए
कोई रोना चाहे तो रो भी न पाए
महज़ इक उस शख़्स की ख़ातिर मैं ने यार
जाने अनजाने में कितने दिल दुखाए
शे'र अपने तो सुनाते हैं सभी ही
कोई हो जो मीर की ग़ज़लें सुनाए
दास्ताँ ही जब अधूरी है किसी की
फिर तुझे वो क्या बताए क्या छुपाए
इश्क़ से कुछ यूँ भरोसा उठ गया है
और कोई भी न अब इस दिल को भाए
— Dileep Kumar















