जो मैं उस के हिस्से में सारा हुआ तो

फिर इक बार वो सब दुबारा हुआ तो

तेरे ख़्वाब तो ऐश ओ आराम के हैं
मेरे साथ जो बस गुज़ारा हुआ तो

हम इस ओर वाले किनारे से वाक़िफ़
वो उस पार वाला किनारा हुआ तो

नफ़े के मआ'नी तो मैं जानता हूँ
मगर जो सफ़र में ख़सारा हुआ तो

जिसे मैं ने समझा था दुश्मन है मुमकिन
मैं उस की ही आँखों का तारा हुआ तो

— Divyansh "Dard" Akbarabadi

More by Divyansh "Dard" Akbarabadi

Other ghazal from the same pen

See all from Divyansh "Dard" Akbarabadi →

Dushman Shayari

Shers of dushman.

All Dushman Shayari poetry →

Similar writers

Voices in the same orbit

Browse by mood

Poetry by feeling