यक़ीन की ही बात थी सो तरबियत में थे नहीं

वगरना बस वो तीन लफ़्ज़ किस लुग़त में थे नहीं

मैं क़ैद था क़फ़स में और वो उड़ रहा था सामने
ये पहली बार था के पंख अहमियत में थे नहीं

सो मैं ने दिल बना के भेज डाला आप के लिए
के आप कम से कम मिरी मुख़ालिफ़त में थे नहीं

मुआ'फ़ कर दिया है हम ने सोच कर के कुछ मगर
तेरे गुनाह तो ऐ यार माज़रत में थे नहीं

वो ऐसा शख़्स जिस के चेहरे पर नक़ाब ही नक़ाब
हम ऐसे शख़्स जो कभी मुनाफ़िक़त में थे नहीं

— Divyansh "Dard" Akbarabadi

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