
मिलने के बा'द हर कोई मसरूफ़ हो गया
जब तक नहीं मिले थे सभी बे क़रार थे
कोई सुख़नवरी थी न कोई हुनर था पास
लेकिन हमारे हक़ में तमाम इश्तिहार थे
— Divyansh "Dard" Akbarabadi
Other sher from the same pen
Shers of ghamand.
Voices in the same orbit
Poetry by feeling