इक गुल बिना इस गुलसिताँ का रंग-ओ-रस बर्बाद है
ऐ हमनफ़स तुझ बिन मेरी तो हर नफ़स बर्बाद है
बर्बाद सावन हो गया बर्बाद जाड़ा हो गया
आगे भी मेरी उम्र का हर इक बरस बर्बाद है
गुलशन निचोड़ा था ख़ुदा ने तब कहीं ये लब बने
उस को नहीं हासिल तो इन होंठों का रस बर्बाद है
फ़िरदौस को जो जानना है तो फ़कत इतना समझ
बर्बाद है, बर्बाद है, बर्बाद बस बर्बाद है
— Firdous khan















