दूर हम सेे कही और जाते हुए

वो लगा हँसने चेहरा छुपाते हुए

तितलियां कह रही हैं हवाओं से ये
ख़ुश्बू लाना किसी गुल से आते हुए

हम ने भी कर लिए सब से रिश्ते बुरे
एक लड़की को अपना बनाते हुए

हम को उन से मुहब्बत हुई क्या करें
जो तरस भी न खाएं सताते हुए

वो मिरी हाथ की उन लकीरों में था
मिट गई है जो घर को बनाते हुए

मैं उसे कैसे समझाऊँ ये बात अब
आँख थक जाती है ग़म छुपाते हुए

उस को लगता तो है चाँद प्यारा बहुत
हाँ मगर अपने कद को घटाते हुए

एक ही ज़िन्दगी तो मिली है हमें
बीत जानी है ये भी मनाते हुए

— Govind kumar

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