मुहब्बत आठवीं कर तो लें हम भी परज़रा सातों का दुख भी कम हुआ होतानहीं की ख़ुद-कुशी ये सोच कर मैं नेफ़क़त अब मौत से भी मेरा क्या होता— Gulfam Ajmeri