गुलों में जाँ जहाँ तक देखते हैं हम
वहाँ तक आप के बस आप के हैं हम
ख़याल-ए-इश्क़ भी आता नहीं हम को
मकीं है तीन और सब से बड़े हैं हम
अदू हैं पर अदब को साथ रखते हैं
हुई शब तो लिए पानी खड़े हैं हम
चमन के फूल थे पर ख़ार रखते थे
लगाया ज़ोर तो जम के गड़े हैं हम
चली जो बात उन की मुस्कुराए हम
वगरना सोचते थे मर चुके हैं हम
नए मेहमाँ से अक्सर दूर रहते हैं
किसी के इश्क़ से जब से चिढ़े हैं हम
कभी 'अंबर' पे हम ने दाव खेला था
गिरे जब से वहीं बिखरे पड़े हैं हम
— Happy Srivastava 'Ambar'















