dil men mere ye gham aashiqi ka raha | दिल में मेरे ये ग़म आशिक़ी का रहा

  - Hasan Raqim

दिल में मेरे ये ग़म आशिक़ी का रहा
मैं फ़क़त उसका होकर भी तन्हा रहा

ये अलग बात है की वो आया नहीं
मुंतज़िर उसके ख़ातिर ये रस्ता रहा

वो शहर छोड़कर के चला भी गया
मैं मगर उस गली से गुज़रता रहा

दूर होने पे इक मैं ही ग़मगीं न था
दूर होने का उसको भी शिकवा रहा

मैं बदलता रहा ख़ुद को उसके लिए
और वो अपना रस्ता बदलता रहा

  - Hasan Raqim

Shehar Shayari

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