दिल में मेरे ये ग़म आशिक़ी का रहा
मैं फ़क़त उसका होकर भी तन्हा रहा
ये अलग बात है की वो आया नहीं
मुंतज़िर उसके ख़ातिर ये रस्ता रहा
वो शहर छोड़कर के चला भी गया
मैं मगर उस गली से गुज़रता रहा
दूर होने पे इक मैं ही ग़मगीं न था
दूर होने का उसको भी शिकवा रहा
मैं बदलता रहा ख़ुद को उसके लिए
और वो अपना रस्ता बदलता रहा
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