ज़िंदगी-भर को ख़फ़ा रहना है
या'नी अब तेरे बिना रहना है
दो बरस बीत चुके हैं तन्हा
कब तलक और जुदा रहना है
इन उदासी भरी सब बातों में
आप का ज़िक्र सदा रहना है
एक दिन ख़्वाब मुकम्मल होंगे
आप को ज़िद पे अड़ा रहना है
कब के ही गुज़रे बहारों के दिन
पेड़ को कितना हरा रहना है
शहर के ख़्वाब सजाने वाले
कहते हैं गाँव में क्या रहना है
— Ajay Kumar















