ग़ौर से हम एक चेहरा सोचते हैं

उस की आँखों का तमाशा सोचते हैं

मैं ज़रा सा एक मतला सोचता हूँ
लोग उस
में दर्द अपना सोचते हैं

जब मुसलसल सोचने की हो रिवायत
तो वहाँ पर लोग सबका सोचते हैं

एक तो तस्वीर पोशीदा रखी है
और अक्सर उस का क़िस्सा सोचते हैं

सब रक़ीबों पर तरस आता है मुझ को
रात भर उस बे-वफ़ा का सोचते हैं

लोगों का अंदाज़ कारोबार का है
और हम कम-बख़्त सादा सोचते हैं

जो भी चारों और सोचा जा रहा है
हम उसी दुनिया के जैसा सोचते हैं

अब मुझे भी सोचना पड़ता है अक्सर
आपने भी तो कहा था सोचते हैं

जिन उजालों की तबाही रात को है
वो उजाले रात को क्या सोचते हैं

कुछ दिसम्बर के नज़ारे ले रहे हैं
कुछ अभी से जनवरी का सोचते हैं

— Ajay Kumar

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