जो ख़ुद से उठ कर पीता नईं था पानी को
अब कांधे पे ढोता है ज़िम्मेदारी को
उस को देख के ख़्वाब में हम ऐसे तड़पे हैं
जैसे तड़पे है कोई प्यासा पानी को
धक्के खाए जिस ने सारी उम्र बसों में
उस ने कार दिया है अपनी शहज़ादी को
— Irshad Siddique "Shibu"
अब कांधे पे ढोता है ज़िम्मेदारी को
उस को देख के ख़्वाब में हम ऐसे तड़पे हैं
जैसे तड़पे है कोई प्यासा पानी को
धक्के खाए जिस ने सारी उम्र बसों में
उस ने कार दिया है अपनी शहज़ादी को
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