जितना भी ग़म था हम सेे भुलाया नहीं गया
कोशिश किया पा दिल को हँसाया नहीं गया
शहर-ए-सितम ने हम को दिए ज़ख़्म हैं बहुत
ज़ख़्मों को अपने हम से दिखाया नहीं गया
इस तरह से हमारी नज़र में वो गिर गया
नज़रों में फिर से हम से उठाया नहीं गया
माना नहीं है ख़ुश के अगर दिख रहे हैं हम
ऐसा नहीं के हम को सताया नहीं गया
चाहा बहुत सुनाए हमारी भी दास्ताँ
पर दास्ताँ का दर्द सुनाया नहीं गया
हम मर गए बरोज़-ए-जुदाई-ए-जान-ए-दिल
हिजरत का दर्द हम से उठाया नहीं गया
— Ishq Allahabadi















