मेरी हुई तो नहीं पर नसीब हो फिर भी
हो दूर मुझ से मगर तुम क़रीब हो फिर भी
तेरा नसीब भी ऐसा हो जैसे मेरा है
लगे न क़ल्ब तेरा भी रक़ीब हो फिर भी
न जाने कैसे मोहब्बत हुई तुम्हें "जाज़िब"
ये जानते हुए भी तुम ग़रीब हो फिर भी
— Chandan Sharma
हो दूर मुझ से मगर तुम क़रीब हो फिर भी
तेरा नसीब भी ऐसा हो जैसे मेरा है
लगे न क़ल्ब तेरा भी रक़ीब हो फिर भी
न जाने कैसे मोहब्बत हुई तुम्हें "जाज़िब"
ये जानते हुए भी तुम ग़रीब हो फिर भी
Other ghazal from the same pen
Shers of dushman.
Voices in the same orbit
Poetry by feeling