tiri galiyaan tire kasbe ko aa.e hain | तिरी गलियाँ तिरे कस्बे को आए हैं

  - jaani Aggarwal taak

तिरी गलियाँ तिरे कस्बे को आए हैं
इक अरसे बाद इस रस्ते को आए हैं

जो धुँदली हो गईं हैं ज़र्द के मारे
उन्हीं यादों से हम मिलने को आए हैं

पुराने फूल तो मुरझा गए लेकिन
नए कुछ फूल हैं खिलने को आए हैं

हमें तुम प्रेम का दीपक समझती थी
तुम्हारी शादी में जलने को आए हैं

तुम्हारे बाद में कैसे बसर होगी
यही मालूम हम करने को आए हैं

उठाई जा रही होगी तिरी डोली
वो मंज़र ध्यान से तकने को आए हैं

तुम्हारी जीत पर देने बधाई और
हम अपनी हार पर हँसने को आए हैं

कोई पूछे तुम्हारा क्या इरादा है
कहें हँसके यहाँ मरने को आए हैं

  - jaani Aggarwal taak

Gulshan Shayari

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