Kaffir
Kaffir
Ghazal

ये प्यार व्यार कभी ख़त्म ही नहीं होता

ये ए'तिबार कभी ख़त्म ही नहीं होता

यूँ एक बार का कह कर घड़ी घड़ी मरना
ये एक बार कभी ख़त्म ही नहीं होता

हराम आशिक़ी है रात ख़त्म होती पर
ये इंतिज़ार कभी ख़त्म ही नहीं होता

कि जानलेवा दिसंबर की सर्द रातों में
मेरा बुख़ार कभी ख़त्म ही नहीं होता

मेरे बग़ैर वो हफ़्ते गुज़ार ले 'काफ़िर'
ये सोमवार कभी ख़त्म ही नहीं होता

— Kaffir

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