मिरी जब याद आएगी वो वापस लौट आएगा
इसी उम्मीद में आख़िर ज़माना बीत जाएगा
लगा कर घूँट मय का जब मुझे वो याद आएगा
मिरा दिलबर मुझे भी वक़्त कितना ही रुलाएगा
कि कितना दर्द अंदर ही दबा कर जी रहा है ये
अकेले में बना कर जाम साक़ी आज़माएगा
मुझे अपना बना कर भी ख़ुदाया मेरे बारे में
न कोई जान पाया है न कोई जान पाएगा
अगर मैं ज़िंदगी दे दूँ तुझे वापस तो तू 'आशीष'
बता कितना करेगा ख़र्च तू कितना कमाएगा
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