ग़ैरतों के मसअले थे
ख़्वाब हम पर हँस रहे थे
जब्र ये था संग था वो
और हम तो आइने थे
इश्क़ ही तो ज़िंदगी है
कितने प्यारे तज़्किरे थे
साथ रहना इश्क़ करना
ये तिरे ही मशवरे थे
इक तिरे होने ही भर से
मुझ में कितने हौसले थे
ख़्वाब की ता'बीर ये है
दूर थे वो जो सगे थे
— Lekhak Suyash















