जिस रस्ते पर दिल जाता है
पैर हमारा छिल जाता है
इतनी प्यास नहीं है मुझ को
जितना पानी मिल जाता है
नाविक चप्पू धीरे चलाओ
मछली का घर हिल जाता है
बस उस के छूने भर से ही
मुरझाया गुल खिल जाता है
उतनी ही यारी बढ़ती है
जितना लंबा बिल जाता है
मैं तो घर ही में रहता हूँ
उस से मिलने दिल जाता है
माहिर माहिर चिल्लाने से
माहिर थोड़ी मिल जाता है
— Vijay Anand Mahir















