तिरी यादों में पत्थर हम नहीं होते

अगर जाते न शाइ'र हम नहीं होते

पता होता हमें गर ख़ाली रहना है
किसी का भी कभी घर हम नहीं होते

सहम कर आज बोलीं हैं मिरी आँखें
तिरे होते न तो तर हम नहीं होते

वही निकला, हमेशा बोलता था जो
मरेगें, बे-वफ़ा पर हम नहीं होते

अगर इंसान ख़ुद इंसान हो जाता
इलाही, रब, पयम्बर हम नहीं होते

कभी तू आज़मा मुझ को न छोड़ेंगे
तिरा जब तक मुक़द्दर हम नहीं होते

मिटा देती मुझे भी कब की ये दुनिया
शराबी, बदचलन गर हम नहीं होते

शिकायत कर रहे हो वस्ल की 'माहिर'
कभी ख़ुद को मुयस्सर हम नहीं होते

— Vijay Anand Mahir

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