यादों में वो आता है और आता भी नहीं है
वो शख़्स मेरे ज़ेहन से जाता भी नहीं है
ज़ालिम के मुझे औरों का होने नहीं देता
उस पर है सितम अपना बनाता भी नहीं है
उस के तो सभी काम इशारों से हुए हैं
हैरत है कि वो होंठ हिलाता भी नहीं है
वो जानता है मेरे सभी तंज़ है उस पर
बे-हिस वो है ऐसा कि जताता भी नहीं है
मैं लड़ रहा था अपनों से उस शख़्स के ख़ातिर
वो शख़्स हाँ जो वा'दा निभाता भी नहीं है
— Marghoob Inaam Majidi















