गए थे हम उन को बुलाने वहाँ पर
न वो थे न मौसम सुहाने वहाँ पर
उन्हें बाँहों में भरने की चाह में तब
गुज़ारे थे कितने ज़माने वहाँ पर
ख़बर क्या परिंदे फँसे जाल में आ
यूँ बिखरे पड़े थे जो दाने वहाँ पर
जो पूछा उन्होंने कि क्या काम है फिर
लगे बात हम भी बनाने वहाँ पर
— Manish Yadav















