मिलता नहीं है हक़ यहाँ हक़दार को
ऐसे चलाते हुक्मराँ सरकार को
आवाज़ अपनी बेच दी सरदार ने
फिर एक पत्थर मार दो सरदार को
अब मीडिया तो बैठती सरकार में
बचता ना दुख कुछ जनता के इज़हार को
फ़ुरसत नहीं मिलती किसी और दिन मुझे
बस इसलिए फ्री रहता हूॅं इतवार को
सीधा अकेला रह गया है हर दफ़ा
और प्यार भर भर के मिला मक्कार को
जिसको विरासत में मिला सब कुछ यहाँ
वो क्या समझता मुफ़्लिसी की मार को
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