रहते हो जिस खोर मुझ को ले चलो तुम
बाँध कोई डोर मुझ को ले चलो तुम
ख़ुश बहुत हूँ पर मगर लगता है फिर भी
हूँ यहाँ कमज़ोर मुझ को ले चलो तुम
अब जिधर से आ रही है ये उदासी
यूँ करो उस ओर मुझ को ले चलो तुम
है जहाँ पर बोलती रहती ख़मोशी
हो जिधर यूँ शोर मुझ को ले चलो तुम
इक तरफ़ सहरा लगा उस से समुंदर
देख ऐसा छोर मुझ को ले चलो तुम
आज भी मुझ को किसी का 'आलम-ए-ख़्वाब
देता है झकझोर मुझ को ले चलो तुम
और तो मुझ को यही सब चाहिए अब
बस किसी भी ओर मुझ को ले चलो तुम
— Aditya Maurya















