मैं जहाँ में जहाँ से गुज़रता गया
थोड़ा थोड़ा वहाँ पर मैं मरता गया
था मैं बे-अक़्ल गुज़रे हुए वक़्त में
जिस ने था जो कहा मैं वो करता गया
मैं वो थे इक गुमाँ में हुआ यूँ कि फिर
बेख़ुदी में तअल्लुक़ बिखरता गया
हाथ जिस ने भी छोड़ा जो मेरा कभी
शख़्स वो ज़ेहन से भी उतरता गया
जब किताबों से ख़ाना मेरा भर गया
फिर मकाँ और मेरा सँवरता गया
उलझनें जो समेटी ग़ज़ल इक बुनी
फिर ये ग़म और ज़्यादा निखरता गया
— Aditya Maurya















