Mirza
Mirza
Nazm

"पागल"

वो ख़ुद को समझते थे
रात का राजा
उन के दोसत थे ,
जुगनु , साए
चांदनी जब शबाब पर होती तो
उन की महफ़िल का
आगाज़ होता
उन की महफ़िल में
तारीकी का रक़्स होता
ग़म के मारे, सब के सब
इकठा होते
जौन की ग़ज़लों को सुनते
अपने महबूब को
दुआएँ देते
अगली रात का इंतिज़ार
करते
यही रोज़ का
मशग़ूल था उन का
लोग उन्हें
पागल कहते !

— Mirza

More by Mirza

Other nazm from the same pen

See all from Mirza →

Similar writers

Voices in the same orbit

Browse by mood

Poetry by feeling