चाहतों के मरने में देर कितनी लगती है

जान से गुज़रने में देर कितनी लगती है

एक उम्र लगती है ख़्वाबों के सजाने में
ख़्वाबों के बिखरने में देर कितनी लगती है

ज़िंदगानी लगती है सीखने में तैराकी
दरिया पार करने में देर कितनी लगती है

कितनी देर लगती है मन किसी का भाने में
मन किसी का भरने में देर कितनी लगती है

फ़ासले बढ़ा कर यूँ दूर दूर मत रह तू
दिल से जाँ उतरने में देर कितनी लगती है

जब कहीं नहीं पहुँचा तो मुझे समझ आया
थोड़ी देर करने में देर कितनी लगती है

जो करे कभी हम पर एक ही नज़र साहिब
बख़्त के सँवरने में देर कितनी लगती है

दिल हमारा बैठा है बातों के भरोसे पर
बातों के मुकरने में देर कितनी लगती है

— MIR SHAHRYAAR

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