चुप रहूँगा मैं और कुछ नहीं बोलूँगा

सब सहूँगा मैं और कुछ नहीं बोलूँगा

नीम-जाँ तेरे लहजे की दहलीज़ पर
मर रहूँगा मैं और कुछ नहीं बोलूँगा

सदियों से सूरत-ए-अश्क था पलकों पर
अब बहूँगा मैं और कुछ नहीं बोलूँगा

ज़िंदगी एक बे-बस के मानिंद सब
ग़म सहूँगा मैं और कुछ नहीं बोलूँगा

— MIR SHAHRYAAR

More by MIR SHAHRYAAR

Other ghazal from the same pen

See all from MIR SHAHRYAAR →

Similar writers

Voices in the same orbit

Browse by mood

Poetry by feeling