दिल तुझे दिल-नगरी में आना नहीं था

बे-सबब ख़ुद को यूँ उलझाना नहीं था

ख़ुद जिसे बख़्शी थी जज़्बों से रवानी
ख़ुद उसी दरिया में बह जाना नहीं था

आ गया था मुझ को जीने का हुनर अब
अब तुझे यूँ लौट कर आना नहीं था

तुझ को लौटाना था तो दिल लौटा देते
पर ये पहला तोहफ़ा लौटाना नहीं था

मैं ने माना अजनबी था तुम से पहले
ख़ुद से लेकिन इतना बेगाना नहीं था

— MIR SHAHRYAAR

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