ख़्वाब जन्नत के दिखाने वाले
हम नहीं झाँसे में आने वाले
कोई कश्ती भी बनाई होती
जा-ब-जा दरिया बनाने वाले
जिस्म से जान निकल जाती है
मुड़ के मत देख यूँ जाने वाले
जो था बे-रंग कभी उस ने भी
सीखे हैं ढंग ज़माने वाले
ये तो सहरा है कोई तू ने क्या
सोचा था बस्ती बसाने वाले
राएगानी का गिला क्या मुझ से
पूछा था मुझ को बनाने वाले
किस से रूठा हुआ है आज तू और
हैं कहाँ तेरे मनाने वाले
कुछ सुराग़-ए-रह-ए-मंज़िल तो छोड़
आख़िरी शम्अ' बुझाने वाले
सोच ले पहले ये आसाँ नहीं है
हाथ उल्फ़त का बढ़ाने वाले
मुझ को मरने दे बचाने से तो
मर रहा हूँ मैं बचाने वाले
पहले दीवार खड़ी ही क्यूँ की
आज दीवार गिराने वाले
जी नहीं लगता नए मौसमों में
लौट आ दोस्त पुराने वाले
जिस की क़िस्मत में था तू उस से पूछ
मुझ को ऐ मुफ़्त में पाने वाले
ऐ ग़ज़ल सर उठा हैं आज कहाँ
वो तिरे सुनने सुनाने वाले















