उसे है ऐसी वैसी बात का दुख
मगर मुझ को है अपनी ज़ात का दुख
जहाँ भी जाता हूँ बस घेरता है
वही गुज़रे हुए लम्हात का दुख
कई हंगामों से गुज़रा मैं लेकिन
नहीं दिल से गया उस रात का दुख
शफ़क़-ज़ादी तुझे कैसे बताऊँ
बिछड़ जाने की पहली रात का दुख
दिल-ओ-जाँ हारने आए थे हम ही
किसे था ऐ मिरी जाँ मात का दुख
जहाँ में ख़ुद से बाहर कौन निकला
कोई समझा कहाँ सुक़रात का दुख
इसी दुख से तो मैं ज़िंदा हूँ अब तक
बहुत प्यारा है अपनी ज़ात का दुख
कम इस दश्त-ए-मुहब्बत में किसी तौर
नहीं होता दिल-ए-बद-ज़ात का दुख
ख़ुदाओं के जहाँ में कौन समझा
सितम-पर्वर्दा आदम ज़ात का दुख
— MIR SHAHRYAAR















