वो जो शब राहों से गुज़रते हैं

लोग उन्हें देख आहें भरते हैं

कैसा मंज़र है उन की आँखों का
हम उन्हीं में सदा ठहरते हैं

वो उसी शा'इरी का मिसरा है
जिस के ख़ुत्बे से हम निखरते हैं

उन की बातों में इक फ़ज़ीलत है
उन के क़ाइल कभी न मरते हैं

है कोई नूर उन के चेहरे में
दूर जाने से सब मुकरते हैं

उन की नज़रों में कोई जादू है
मेरे लम्हें न यूँ बिसरते हैं

हैं वो ख़ुशबू किसी गुलिस्ताँ की
फूल सजदे में आ उतरते हैं

वो हैं इक ख़्वाब इक तसव्वुर हैं
उन की ख़ातिर मलक सँवरते हैं

वो है फ़िरदौस मेरे आलम की
चाँद तारे वहाँ उभरते हैं

उन का एहसास आसमानी है
वो ज़मीं पे क़दम न धरते हैं

है उन्हीं का रुसूख़ ऐ अकरम
इश्क़ हम बेवजह न करते हैं

— Mohammad Akram

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