बंद इक घर में उजाला देखता हूँ
मैं खुली आँखों से सपना देखता हूँ
उस को उस
में ही मैं खोया देखता हूँ
उस की आँखों का अक़ीदा देखता हूँ
कैसे कैसे ख़्वाब हर शब देखता हूँ
उस को इन बाहों में सोया देखता हूँ
नींद से मैं जाग उठता हूँ उसी पल
पास में जब उस को बैठा देखता हूँ
उस ने मुड़ कर फिर कभी वापस न देखा
मैं पलट कर जिस का रस्ता देखता हूँ
— Ammar 'yasir'















