ग़ज़ल के हुस्न का जब हम सिंगार करते हैंहर एक लफ़्ज़ को आईनादार करते हैंबना बना के मिटाते हैं सैकड़ों खा़केतब एक शे'र को बेहतर शुमार करते हैं— Moid Rahbar