नम आँखें ये अपनी किसी पल भिगोते हुए

बहा दूँगा बीनाई मैं अपनी रोते हुए

उस अब्र-ए-रवाँ से नहीं ख़ास शिकवा मगर
मुयस्सर न था वो मुझे मेरा होते हुए

ख़यालात तेरे कि सोने नहीं देते और
तिरे ख़्वाब ही देखता हूँ मैं सोते हुए

अब उस से नहीं ख़ास कोई गिला भी मगर
मुझे चाहता था कि खोए वो रोते हुए

कभी पैरहन मैं न ऐसा करूँ दाग़-दार
तुम्हें बू किसी की न आ पाए धोते हुए

ख़ुदा की इनायत है ये जो हैं हम 'मुंतज़िर'
उसे वर्ना उम्मीदें खो दी थी खोते हुए

— Muntazir shrey

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