ख़ुशबू में घुल गया है तेरा वजूद कैसा
हर सिम्त गूँजता है अब ये सुरूर तेरा
चुप-चाप देख लेना दिल पर असर हुआ है
आँखों के आइने में है कुछ छुपा छुपा सा
तू पास आ गया तो साँसें हुईं ग़ज़ल सी
तू दूर हो तो जैसे सहरा हो और धुआँ सा
पत्तों ने छेड़ डाली इक दास्ताँ नई सी
लब पर जो नाम आया फूलों ने रंग बदला
आँखों की रौशनी में जादू सजा हुआ है
हर दर्द मिट गया है तेरा करम जो पाया
तेरा ख़याल रखता है मुझ को मेरी हद में
वर्ना ये दिल सदा से आवारगी में पाला
हर शाम कह रही है तू रात बनके आए
आलम लगे बुझा सा तेरी कमी से सारा
— Vikas Shah musafir















