तेरे बिन दिल को किसी शय में भी अब राहत नहीं है
जुस्तजू में है बसा तू फिर भी अब क़ुर्बत नहीं है
हर नज़र में बस रहा तू और कोई भी नहीं अब
इश्क़ ऐसा है कि इस
में कोई और हसरत नहीं है
नाम ले कर सज़्दे में भी रूह ये थमती नहीं अब
अब ज़माने की किसी भी बात में लज़्ज़त नहीं है
तू ही दरिया तू ही साहिल और मंज़िल भी है तू ही
तेरे बिन कोई भी मंज़र कोई भी बरकत नहीं है
जब से आया दिल में तू तब से ये दिल हैरान रहता
तेरी चाहत के सिवा और कोई भी आदत नहीं है
— Vikas Shah musafir















