जिस दिन मेरे कहने पर था घर से भागा वो
मैं भी डरा हुआ था उस दिन सहमा सहमा वो
जब तक इल्म मुझे हो पाया उस से मोहब्बत का
तब तक तो मुझ से काफ़ी दूर जा चुका था वो
इज़्ज़त थी मेरी पर सिक्का उस का चलता था
नोट था मैं दो हज़ार का और सौ दो सौ का वो
पास में घर होना भी जैसे भारी दिक़्क़त थी
कभी भी मिलने आ जाता था चलता फिरता वो
है मुंतज़िर रखा उस ने जितना तुम को अब तक
मुझ से शर्त लगा ले 'नाज़' नहीं आएगा वो
— Naaz ishq















