Naaz ishq

Naaz ishq

@Naaz_ishq

Naaz ishq shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Naaz ishq's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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Sher

उस को हम में दिलचस्पी थी और हमें थी ग़ज़लों में दो मिसरे कहने थे उस को इतना भी न हुआ उस से — Naaz ishq
जिन राहों से यार कभी हम गुज़रे हैं कोई और होता तो गुज़र गया होता — Naaz ishq
मैं ने थोड़ी और हिम्मत करली होती काश उस दिन फिर न मुझ को ये बताना पड़ता फिर सब देख लेते — Naaz ishq
काश इक बार फिर मोहब्बत हो इस दफ़ा पर मेरी तरफ़ से नहीं — Naaz ishq
अब हस्ब-ए-आरज़ू न कोई न जुस्तजू है अब अब तो कोई भी मिल जाए गुज़ारा कर लेंगे — Naaz ishq
याद आता है रक़ीब से रोज़ उस का झगड़ा करना और फिर मुझ सेे आ के उस की रोज़ शिक़ायत करनी — Naaz ishq
जब तक इल्म मुझे हो पाया उस से मोहब्बत का तब तक तो मुझ सेे काफ़ी दूर जा चुका था वो — Naaz ishq
हक़ ज़िंदगी पे मेरी भी अब मेरा नहीं है अब ख़ुद-कुशी अगर की तो चार जन मरेंगे — Naaz ishq
अगर हटती निगाहें उस के चेहरे से मैं साड़ी पहनी तो तब देखता उस की — Naaz ishq

Ghazal

हयात क्या है कि वहम-ओ-गुमान में गुज़री मुझे ख़बर ही नहीं क्या जहान में गुज़री तमाम उम्र की सोहबत उस एक शख़्स के साथ उसी से तर्क-ए-त'अल्लुक़ के ध्यान में गुज़री वफ़ा बहुत थी बहुत बेची ख़ुद गुरेज़ किया दुकानदार की जैसे दुकान में गुज़री न दोस्ती थी न इख़्लास था न इश्क़ न ज़ोर मैं क्या बताऊॅं कि क्या दरमियान में गुज़री मैं उस के साथ हो कर भी उसे तरसता रहा तमाम उम्र मेरी इम्तिहान में गुज़री गुज़र गई बड़ी आसानी से शब-ए-हिज्राँ बहुत मुशक़्क़तों से दरमियान में गुज़री अजब सफ़र किया मैं ने कि ज़िन्दगी सारी गए दिनों की कसक और थकान में गुज़री ख़ुशी में 'नाज़' रहा क़हक़हों का शोर बहुत उदास उदास जो भी थी अमान में गुज़री — Naaz ishq
गीत सुनते हैं कोई दिल को लुभाने वाला नींद तो ले उड़ा है ख़्वाब दिखाने वाला बिल्कुल ऐसे ही तुम्हें प्यार किया था हम ने जिस तरह रंगों से तस्वीर बनाने वाला हिज्र में क्या है कि पत्थर हुए जाते हैं हम ढूॅंढ लाओ वो शब-ओ-रोज़ रुलाने वाला हाथ जोड़े खड़ा था जो न पसंद आया उसे रास आएगा कोई हाथ उठाने वाला झील सी आँखों की ता'रीफ़ ही करनी थी बस काम बेकार किया अश्क उठाने वाला टूट के बिखरे भी तो ख़ैर कोई बात नहीं दौर अच्छा था मगर ख़्वाब सजाने वाला क्या अजब शख़्स है वो तरक- ए-मुहब्बत कर के मुझ में अब ढूॅंढता है दोस्त पुराने वाला दिल शब-ओ-रोज़ मुझे कहता है लानत है नाज़ कि पशेमाँ भी नहीं छोड़ के जाने वाला — Naaz ishq
अपनी बात मनाने को हम आँख भिगोया करते थे खेलना होता था आँगन में बीज न बोया करते थे दिन अब निकलने को होता है पलकें हल्की होती हैं और इक वक़्त था जब हम दिन ढलते ही सोया करते थे डूब गए कब प्यार मोहब्बत में हम को मालूम नहीं हम तो पानी में काग़ज़ की नाव डुबोया करते थे ख़ुद्दारी और नफ़रत के कीड़ों ने की फ़सलें बर्बाद क्योंकि वो बीज मोहब्बत के थे जो हम बोया करते थे हाथ छुड़ाया पापा का और कितना दूर चले आए पहले तो बस उॅंगली छूट गई और खोया करते थे कैसे कपड़े पहने हैं मैं ने कैसा दिखता हूँ मैं कोई पर्वा नहीं थी कितने सादा होया करते थे 'नाज़' पतंग जवानी की बचपन में ऊॅंची उड़ती थी क्योंकि हम उस की डोरी में कुछ ख़्वाब पिरोया करते थे अम्मी की बातें सुनता हूँ तो हैरत होती है 'नाज़' भाई बहन में सब सेे ज़्यादा तुम ही रोया करते थे — Naaz ishq
वक़्त कम था सो घड़ी उस सेे छुपाए रक्खी और कोई न कोई बात चलाए रक्खी उस ने दीपक को हवाओं के हवाले कर के चार-सूँ हाथों से दीवार बनाए रक्खी याद हो भी कि न हो उस को कि उस ने कही थी हम ने जो बात सदा दिल से लगाए रक्खी उस ने दिल तोड़ दिया और समेटे रक्खा हम बिखरते गए पर धार बचाए रक्खी साथ था तो किसी ने कुछ न कहा उस के खिलाफ़ और जब बिछड़ा तो हर शख़्स ने राए रक्खी रौशनी करते गए वादा-ओ-पैमाँ तेरे उम्र भर दिल में मगर आग लगाए रक्खी इस भरम में कि किसी रोज़ पलट आएगा वो इक ग़ज़ल उस के लिए हम ने सजाए रक्खी पाक इरादों को मेरे देख ज़रा 'नाज़' कि तू ख़्वाब में आया भी तो सामने चाए रक्खी — Naaz ishq
यार का ज़िक्र हुआ अहद-ए-सुख़न में जैसे चाशनी घुल गई हो गुड़ की रसन में जैसे कभी उठते से सुनो सुब्ह का लहजा उस का किसी कोयल के सुर-ओ-ताल थकन में जैसे आशनाई थी तकल्लुफ़ से भरी पहले पहल बर्क़ उठती थी उसे देख बदन में जैसे अव्वल अव्वल तो किया उस की हवस पे तन्क़ीद निय्यतें पाक बड़ी थी मेरे मन में जैसे बिल्कुल ऐसी ही लकीरें मेरे हाथों पे हैं उस की पेशानी पे उभरी थी शिकन में जैसे जा-ब-जा देख रही उस की निगाह-ए-सय्याद चील उड़ती हो कोई नील गगन में जैसे है गुमाँ उस को भी या सिर्फ़ मुझी को है भरम कि यहाँ तप रहे हैं लोग जलन में जैसे रुत खिजाँ की थी मगर गुल सर उठाने लगे हैं उस की आमद की ख़बर महकी चमन में जैसे शे'र तो शे'र मगर मिसरे भी ऐसे है कि 'नाज़' अप्सरा है वो पुराण और कथन में जैसे — Naaz ishq

Nazm

"इबहाम" ये कौन से नगर आया हूँ मैं कि ख़्वाब यहाँ क़फ़स में हैं कि समेटे हुए हैं इल्म नहीं तसव्वुरात किसी सानिहे की डोरी से उलझ गए कि लपेटे हुए हैं इल्म नहीं निगाह हो कि ज़बाँ हो कि शहर-ए-दिल कि यहाँ हर एक शहर से पेचीदगी ज़ियादा है बॅंधे हुए हैं ख़याल इतने और गहरा सुकूत हर इक ख़याल ज़बाँ से परे निहादा है ये कैसे होंठ कि जो जुम्बिशें नहीं करते ये किस तरह की नज़र जिस में तीरगी है फ़क़त ये चाहते हैं सदाऍं सभी रसन बस्ता ये कान हैं कि जिन्हें रास ख़ामुशी है फ़क़त मैं थक के बैठ गया तो लगा कि दूर कहीं दबी हुई सी सदाएँ पुकारती हैं मुझे क़दम बढ़ाए तो कुछ ख़्वाहिशें दिखी और मैं जिन्हें जिन्हें हूँ मुयस्सर निहारती हैं मुझे शदीद ख़्वाब जो अल्हड़पने में देखे थे मुझे वो आज बड़ी हसरतों से तकते हैं बची हुई वफ़ा और अधमरी उमीद के साथ तमाम शौक़ बड़ी नफ़रतों से तकते हैं मैं इस के बा'द उतर आया और गहरा जहाँ फ़क़त थी याद-ए-गुज़िशता ख़याल-ए-मुस्तक़बिल मैं सेहन कर न सकूॅंगा अब और कुछ कि मुझे यहाँ से ले चलो और छोड़ आओ शहर-ए-दिल हर एक रोज़ वही रट वही सवाल कि 'नाज़' तू जानता है यहाँ हिजरतें नहीं होती ये खेल ज़ेहन में चलता है अहद-ए-फ़ुर्सत में तो ले चलो कि जहाँ फु़र्सतें नहीं होती — Naaz ishq
"मैं ने उस सेे सीखा है" एक ज़माना ऐसा था मैं रूठा रूठा रहता था अब तो लहजा मीठा है मैं ग़ुस्सा ग़ुस्सा रहता था एक घुटन सी रहती थी जज़्बात नहीं बहते थे जिन आँखों में अब नूर है इन में दरिया बहता था यक़ीं न होता था मुझ को और किसी की बातों पर लोगों से तो अब मिलता हूँ तन्हा तन्हा रहता था दिल के सारे दरवाज़े मैं ने अंदर से बंद किए थे एक दरीचा मगर खुला रह गया था मुझ से और उसी से वो अंदर आया और उस ने ला-इल्मी ही सब के सब दरवाज़े खोल दिए तुम हॅंसते मुस्कुराते रहना दिल की बातें खुल के कहना मैं जो कोई रोज़ चली भी जाऊॅं अपने आप से मिलते रहना और उस ने ये जाते वक़्त कहा था कि नाज़ ज़िंदगी खुल के जीना तुम में और मुझ में बस फ़र्क इतना है तुम को शायद आता था मैं ने उस सेे सीखा है — Naaz ishq
"तशवीश" मुझ को ये डर है कि शायद ये सब कुछ सच हो जाएगा आज का दिन निकला है जैसे यूँँॅं कल का भी निकल जाएगा फिर धीरे-धीरे क्या होगा मेरी सालों की मेहनत पर ये क़िस्मत पानी फेरेगी मैं अल्हड़-पन से निकलूॅंगा और ज़िम्मेदारी घेरेगी कॉलेज ख़त्म हो जाएगा फिर नौकरी करूँॅंगा मैं और दस पंद्रह हज़ार के ख़ातिर दिन और रात मरूॅंगा मैं दिन दफ़्तर में जाएगा और रात ख़यालों में जाएगी फिर इस सोच में दिन निकलेंगे अपनी बारी आएगी मगर नहीं आएगी इक इतवार ज़रूर आएगा छह दिन बा'द कहीं जा कर के एक महीने की तनख़्वाह इक हफ़्ते में ख़त्म फिर दूर-दूर तक नहीं दिखेंगे नाज़ ग़ज़ल और नज़्म शौक़ दबाता जाऊॅंगा फ़र्ज़ निभाता जाऊॅंगा फिर धीरे-धीरे क्या होगा शादी की बातें होंगी दिन दफ़्तर में जाएगा साथ किसी के रातें होंगी जो शाख-ए-उम्मीद पकड़ के बैठा हूँ ये भी इक दिन जल जाएगी फिर धीरे-धीरे क्या होगा नाज़ जवानी ढल जाएगी मुझ को कुछ करना था मुझ को कुछ बनना था मगर नहीं कर पाया मैं बाक़ी सब तो कर लेंगे कुछ अपना ही रह जाएगा ये दुनिया घूमने का सपना सपना ही रह जाएगा फिर हर रोज़ पशेमाँ हो के मैं बीती बातें सोचूॅंगा और ख़ुद को कोसूॅंगा ये भी किया जा सकता था वो भी किया जा सकता था यूँँॅं ज़िन्दगी गुज़ार दी है खुल के जिया जा सकता था और फिर अपनी नज़्म पढूॅंगा उम्र निकलती जाएगी मौत का ख़ौफ़ रहेगा फिर धीरे-धीरे क्या होगा इक दिन इन सब से तंग आके मैं शायद ख़ुद-कुशी करूँॅंगा शे'र लिखा होगा दीवार-ओ-दर पर एक बहुत अच्छा सा लगता है हर रोज़ यही इक ऐसा दिन भी आएगा मुझ को ये डर है कि शायद ये सब कुछ सच हो जाएगा — Naaz ishq
"फ़ैज़" मुझे तुम छोड़ कर फिर से न जाना दोबारा मैं तुम्हें अपना रहा हूँ पुरानी मैं सभी बातें भुला दूँगा तुम्हें सब याद है या फिर नहीं है क्या पता लेकिन मुझे सब याद है मैं ने यही सब कुछ कहा था मगर तुम ने किया क्या जो तुम्हें करना था तुम उस बरसात के जैसी हो हमेशा जो ग़लत मिक़दार में होती है कभी ज़्यादा कभी कम और बे-मौसम फ़क़त मिट्टी भिगोने के लिए न जाने अब मुझे क्या हो गया है फ़ज़ाओ में कहानी सी नज़र आती है अब हर इक वो चीज़ जो मैं देखता हूँ हमारी ही कहानी लगती है सब , वो नदी देखो तुम्हें लगता नहीं मैं वो नदी हूँ और वो बादल तुम नदी सूखी हुई बादल भरे नदी है मुंतज़िर बरसात की मगर बादल गुज़र जाएगे दोबारा लौट कर आएगे मगर फिर से वही होगा यही होता है मेरे साथ भी हर बार भॅंवर हूँ मैं किनारे तुम ख़ला हूँ मैं नज़ारे तुम मैं हूँ पतझड़ बहारें तुम तुम्हारा मैं हमारे तुम नहीं ऐसा नहीं है अलग है हम बहुत तुम्हें मैं बे सबब ही याद करता रहता हूँ तुम्हारे पास जब कोई नहीं होता वहॉं मैं नफ़ा हो तुम ख़सारा मैं तुम्हीं हो चाँद तारा मैं मोहब्बत और कोई है गुज़ारा मैं दोबारा पास आओगी तुम सहेगा कौन दोबारा मैं सदाए दूँगा तुम को मैं पुकारूॅंगा मगर मेरी ये इल्तिज़ा है तुम सेे मत आना लौट कर — Naaz ishq
ऐ उदास लड़की जहाॅं से रूठी हुई ऐ उदास लड़की तुझे ख़बर नहीं तिरा हुस्न ओ जमाल ढल रहा है कई बरस से बदन पे वही दरीदा लिबास तेरा ये चेहरा मगर पैरहन बदल रहा है निगाह से नज़र आता है मुंतज़िर है तू लबों पे वज़्न-ए-गोहर गर्द-ए-राह ख़्यालों पर अगर कभी कोई जो गुफ़्तगू करे तुम सेे तो होगी इब्तिदा और इंतिहा सवालों पर तेरे मिज़ाज में ये ख़ामोशी न थी पहले मैं जानता हूँ कि इस का तवील सिलसिला है तमाशबीन कोई भी क़यास कर लेगा ये कम सुख़न किसी ग़म में ज़रूर मुब्तिला है उमीद-ए-यार में बुझती हुई ये चश्म-ए-तर इसी गुमान में तू कब तलक जलाएगी भुला के दहर तू जिन साअ'तों में खोई है न कट सकेंगी मगर उम्र बीत जाएगी सराब-ए-नक़्श इस उम्मीद के मिटा दो तुम मैं शहर-ए-ख़्वाब के ख़ाकों में रंग भर दूँगा मैं जानता हूँ कि मुश्किल है पर तू मेरी तरफ़ क़दम बढ़ा मैं तुम्हें फिर हसीन कर दूँगा — Naaz ishq
"मुहासबा" दोबारा क्यूँँ फिर अब तुम लौट आए हो ग़मों का सिलसिला भी साथ लाए हो मशक़्क़त की बहुत तुम को भुलाने में क़सर छोड़ी न तुम ने याद आने में ख़ला ओ बे-कली तो आम थी पहले तुम्हारी दीद ना-उम्मीद थी जैसे समेटे और फेंके फिर अकेले ने हमारे वादों के टूटे हुए टुकड़े उठाते वक़्त मुझ को कुछ चुभे भी हैं इन्हीं ज़ख़्मों से हर शब खेलता था मैं ख़ुदा कोई करिश्मा कर गया मोहसिन इन्हें भी वक़्त आख़िर भर गया मोहसिन कोई भी रात दिन हाइल नहीं आती तुम्हारी याद अब बिल्कुल नहीं आती हमारे भी ख़ुशी से दिन निकलते हैं तुम्हारे भी ख़ुशी से दिन निकलते हैं तुम इन ज़ख़्मों को फिर से मत कुरेदो अब पुरानी बातों को फिर से न छेड़ो अब दोबारा फिर मेरा तुम दिल दुखाओगे मुझे तुम इस दफ़ा भी छोड़ जाओगे सो तज्दीद-ए-मरासिम क्यूँँ किया जाए शिफ़ा ज़ख़्मों को आख़िर क्यूँँ छुआ जाए कि अब मुझ में न हिम्मत है न ताकत है तुम्हारी अब न आदत है न चाहत है — Naaz ishq
"इक लड़की सीधी साधी सी" इक लड़की सीधी साधी सी उस सेे रोज़ मुख़ातिब होता हूँ रोज़ कुछ ऐसी बात आती है कोई सवाल आता है ऐसा वो जिस सेे भाग जाती है हम दोनों की इक आदत है मेरी कुछ ज़्यादा बतलाना और उस की हर बात छुपाना बातों बातों में ही गर कोई बात जो निकली और कहीं तो बात बदलने लगती है कोई बात छुपाने लगती है उस सेे हाल-ए-दिल पूछूॅं तो ग़ज़ल सुनाने लगती है गाने गाने लगती है एक मुखौटा पहना है बस और वो इतनी देर से पहना है कि अगर उतारे भी कभी तो उस को लगता है ऐसा ये तो और कोई है ना यूँँॅं बात बात पे हॅंसते रहना सब है अच्छा अच्छा कहना घर बार यार और ख़ुद से दूर फिर भी अकेले ख़ुश रहना है सब झूठ छलावा धोका इतना ख़ुश तो कोई नहीं होता — Naaz ishq