विसाल-ओ-हिज्र तो जीवन में ऐसा था कि लगता है
तुम्हें मेरे मुक़द्दर में लिखा लिख के मिटाया है
समझता है यही वो भी यही मैं भी समझता हूँ
मैं उस को याद करता हूँ वो मुझ को याद करता है
तेरे होते भी सब को मेरी जानिब खींच लूँगा मैं
तिरी आँखों से मेरे ज़ख़्मों में गहराई ज़्यादा है
कभी में'आर तक तुम तो हमारे आ नहीं सकते
यहीं कहना तुम्हारा था यही कहना हमारा है
बिछड़ के मुझ से वो भी शा'इरी करने लगा है अब
मैं उस पे शे'र कहता हूँ वो मुझ पे शे'र कहता है
— Naaz ishq















