किस का दुख और कैसा दुख
भरी जवानी ऐसा दुख
ढूँढ़ता फिरता हूँ हर सम्त
दौलत शोहरत पैसा दुख
हँस के गले लगाया हम ने
तुम ने रोया जैसा दुख
ख़ुद में खोया रहता हूँ
जैसी सोहबत वैसा दुख
ख़त्म नहीं होने वाला
जीते जी तो ऐसा दुख
मिरी दुकान-ए-दिल से लो
जैसा चाहो वैसा दुख
दिल में डेरा डाले है
बिल्कुल मीर के जैसा दुख
'नाज़' मोहब्बत नहीं हुई
फिर ये तुम को कैसा दुख
— Naaz ishq















